श्रीजगन्नाथ मंदिर और नीलमाधव की पौराणिक गाथा: एक विस्तृत वृत्तांत

श्रीक्षेत्र की महिमा

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में चार धामों का विशेष महत्व है, जिनमें से एक ‘श्रीक्षेत्र’ (पुरी) को साक्षात वैकुंठ माना गया है। यह वह स्थान है जहाँ भगवान विष्णु अपनी लीलाओं को विराम देकर भोजन करते हैं। श्रीक्षेत्र की प्रतिष्ठा के विषय में संस्कृत के ब्रह्म पुराण, नारद पुराण, स्कंद पुराण (उत्कल खंड), कपिला संहिता और ओड़िया साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘देउल तोला’ में विस्तार से वर्णन मिलता है। इन सभी ग्रंथों का सार एक ही है—भगवान का अपने भक्तों के प्रेम के वश होकर ‘दारु’ (काष्ठ) रूप में प्रकट होना।

राजा इन्द्रद्युम्न का संकल्प और दिव्य खोज

सतयुग के समय मालव देश (वर्तमान मध्य प्रदेश का क्षेत्र) में राजा इन्द्रद्युम्न शासन करते थे। वे महान विष्णु भक्त और परम प्रतापी सम्राट थे। उनके मन में भगवान के ऐसे रूप के दर्शन की अभिलाषा जागी, जो इस पृथ्वी पर साक्षात विद्यमान हो। उन्होंने अपने पुरोहित और राज्य के विद्वानों से चर्चा की। उन्हें ज्ञात हुआ कि उत्कल (ओडिशा) के नील पर्वत पर भगवान ‘नीलमाधव’ के रूप में निवास करते हैं और एक शबर (आदिवासी) राजा उनकी गुप्त रूप से पूजा करता है।

राजा ने चारों दिशाओं में दूत भेजे। उत्तर, दक्षिण और पश्चिम से दूत निराश होकर लौटे, लेकिन पूर्व दिशा में गए ब्राह्मण ‘विद्यापति’ को सफलता मिली।

विद्यापति की यात्रा और शबर राजा विश्वावसु

द्यापति जब उत्कल पहुँचे, तो वे एक शबर बस्ती में रुके। वहाँ उनकी भेंट शबर राजा विश्वावसु से हुई। विश्वावसु की पुत्री ललिता ने विद्यापति की सेवा की और कालांतर में उनका विवाह हो गया। विद्यापति ने देखा कि विश्वावसु प्रतिदिन शाम को जब घर लौटते थे, तो उनके शरीर से दिव्य सुगंध (कस्तूरी और कपूर की महक) आती थी।

पूछने पर ललिता ने बताया कि उसके पिता प्रतिदिन गुप्त रूप से नील पर्वत पर जाकर भगवान नीलमाधव की पूजा करते हैं। विद्यापति ने भगवान के दर्शन की इच्छा जताई। पहले तो विश्वावसु तैयार नहीं हुए, लेकिन अंततः अपनी पुत्री के अनुरोध पर वे विद्यापति को ले जाने के लिए सहमत हुए। हालांकि, उन्होंने एक शर्त रखी कि वे विद्यापति की आँखों पर पट्टी बाँधकर उन्हें ले जाएँगे ताकि मार्ग गुप्त रहे।

चतुर विद्यापति ने अपनी पत्नी की सलाह पर अपनी पोटली में सरसों के बीज रख लिए और मार्ग में उन्हें गिराते गए। बाद में, जब वर्षा हुई और सरसों के पौधे उगे, तो उन्होंने मार्ग की पहचान कर ली। नील पर्वत पर पहुँचकर विद्यापति ने भगवान नीलमाधव के नीलमणि से निर्मित अत्यंत सुंदर विग्रह के दर्शन किए।

भगवान का अंतर्धान और अश्वमेध यज्ञ

जैसे ही विद्यापति ने दर्शन किए, आकाशवाणी हुई कि अब भगवान इस नीलमणि रूप को त्यागकर ‘दारु’ (लकड़ी) के रूप में प्रकट होंगे। देखते ही देखते भगवान नीलमाधव अंतर्धान हो गए। विद्यापति वापस लौटे और राजा इन्द्रद्युम्न को सारा वृत्तांत सुनाया।

राजा इन्द्रद्युम्न भारी सेना के साथ नील पर्वत पहुँचे, लेकिन वहाँ उन्हें भगवान के दर्शन नहीं हुए। राजा को संदेह हुआ कि शबरों ने मूर्ति छुपा दी है, इसलिए उन्होंने विश्वावसु को बंदी बना लिया। तब भगवान ने पुनः आकाशवाणी की कि विश्वावसु निर्दोष है और वे स्वयं अपनी इच्छा से अंतर्धान हुए हैं। भगवान ने निर्देश दिया कि राजा एक विशाल मंदिर का निर्माण करें और उसकी पूर्णता के लिए ‘अश्वमेध यज्ञ’ करें।

राजा ने मंदिर बनवाया और एक हजार अश्वमेध यज्ञ संपन्न किए। यज्ञ की समाप्ति पर उन्हें स्वप्न में निर्देश मिला कि समुद्र के किनारे (बाँकी मुहाण) पर एक विशाल दिव्य वृक्ष (दारु) तैरता हुआ आएगा, जिस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिह्न होंगे।

दिव्य दारु और रहस्यमयी वृद्ध बढ़ई

राजा अपनी सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँचे और उस दिव्य लकड़ी को देखा। राजा की विशाल सेना और हाथियों के दल ने उस लकड़ी को हिलाने का प्रयास किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। तब आकाशवाणी के अनुसार, भक्त विश्वावसु और ब्राह्मण विद्यापति को बुलाया गया। उन दोनों ने जैसे ही लकड़ी को स्पर्श किया, वह आसानी से खींचकर ‘आड़प मंडप’ तक ले जाई गई।

अब चुनौती थी मूर्तियों के निर्माण की। देश के श्रेष्ठ बढ़ई बुलाए गए, लेकिन जैसे ही वे उस दिव्य लकड़ी पर अपने औजार चलाते, उनके औजार टूट जाते। कोई भी उस लकड़ी को काट नहीं पा रहा था। तभी स्वयं भगवान विष्णु एक वृद्ध बढ़ई (विश्वकर्मा) के भेष में प्रकट हुए। उन्होंने राजा से कहा कि वे 21 दिनों में मूर्तियों का निर्माण कर देंगे, लेकिन शर्त यह है कि वे एक बंद कमरे में कार्य करेंगे और उस दौरान कोई भी दरवाजा नहीं खोलेगा।

मूर्तियों का अधूरा स्वरूप और कलियुग का विधान

पंद्रह दिन बीत जाने के बाद, मंदिर के अंदर से हथौड़े की आवाज आनी बंद हो गई। राजा की रानी ‘गुंडिचा’ व्याकुल हो उठीं। उन्हें डर लगा कि कहीं वृद्ध बढ़ई को कुछ हो तो नहीं गया। रानी के आग्रह पर राजा ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी और दरवाजा खोल दिया।

अंदर वृद्ध बढ़ई गायब थे और चार मूर्तियाँ—जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र—अर्धनिर्मित (अधूरी) अवस्था में विद्यमान थीं। उनके हाथ-पांव पूरे नहीं बने थे। राजा अत्यंत दुखी हुए और अपनी भूल पर पश्चाताप करने लगे। तभी भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा—

“हे राजन! दुखी न हों। मैं इसी रूप में कलियुग में पूजित होना चाहता हूँ। यह मेरा ‘बौद्ध’ या ‘दारु’ अवतार है। मेरे हाथ-पांव न होते हुए भी मैं सब कुछ ग्रहण कर सकता हूँ और पूरे जगत की रक्षा कर सकता हूँ।”

ब्रह्मा जी द्वारा प्रतिष्ठा और गाल राजा का प्रसंग

मूर्तियों की प्रतिष्ठा के लिए राजा इन्द्रद्युम्न ब्रह्मलोक गए और ब्रह्मा जी को आमंत्रित किया। ब्रह्मलोक का समय पृथ्वी से भिन्न होता है, इसलिए राजा को वहाँ कुछ समय प्रतीक्षा करनी पड़ी। इस बीच पृथ्वी पर कई युग बीत गए।

जब राजा वापस लौटे, तो उन्होंने देखा कि समुद्र की रेत ने उनके बनवाए मंदिर को ढक दिया है। उस समय के राजा ‘गाल’ ने मंदिर को खोज निकाला था और अपना अधिकार जता रहे थे। अंततः कछुओं और प्राचीन साक्ष्यों की गवाही से यह सिद्ध हुआ कि मंदिर इन्द्रद्युम्न ने ही बनवाया था। ब्रह्मा जी ने स्वयं आकर मंदिर की प्रतिष्ठा की और मूर्तियों को ‘श्री मंदिर’ में स्थापित किया।

सार्वभौमिक प्रेम का प्रतीक

भगवान जगन्नाथ की यह कथा हमें सिखाती है कि भक्ति में जाति, वर्ण या रूप का कोई बंधन नहीं है। जहाँ विश्वावसु जैसे आदिवासी भक्त का प्रेम है, वहीं विद्यापति जैसा ब्राह्मण ज्ञान है और इन्द्रद्युम्न जैसा राजा का समर्पण। भगवान के ये ‘अधूरे’ हाथ वास्तव में पूरे संसार को गले लगाने के लिए फैले हुए हैं। आज भी पुरी में भगवान उसी रूप में पूजे जाते हैं, जो यह संदेश देता है कि ईश्वर बाहरी सुंदरता में नहीं, बल्कि भक्त के भाव में बसता है।

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